🌑 Dark World Universe – Day 17 : The Eclipse of Memory

 

🌑 Dark World Universe – Day 17 : The Eclipse of Memory

(An Om Trivedi Chronicle — from the Dark World Universe)

कभी-कभी स्मृतियाँ भी ग्रहण में चली जाती हैं।
वे मिटती नहीं, बस छाया में विश्राम लेती हैं,
और जब समय का आकाश पुनः उजला होता है,
तो वे किसी नई आकृति में लौट आती हैं।

उस रात मैं — Om Trivedi — गंगा की सीढ़ियों पर मौन था।
अंतरिक्ष में ग्रहण लग चुका था।
चंद्रमा के चारों ओर नीली अंगार-सी आभा थी,
और हवा में अतीत की गंध तैर रही थी।






🔹 The Shadow of Remembrance

ग्रहण के प्रारम्भ के साथ ही चारों दिशाओं से स्वर उठने लगे।
वे न मंत्र थे, न प्रार्थना —
बल्कि स्मृतियों की फुसफुसाहट।
हर स्वर किसी बीते युग की झलक था।
मुझे दिखा — प्राचीन यज्ञ,
लंदन के भूमिगत कक्ष,
और कहीं दूर कोई अधूरी प्रतिज्ञा।

“Om Trivedi,” किसी ने भीतर कहा,
“जो कुछ तुम खोजते हो,
वह सब तुम्हारी ही स्मृतियों की परछाई में छिपा है।”


🔹 The Chamber of Forgotten Echoes

मैंने आँखें मूँदीं।
अंधकार के भीतर एक द्वार खुला।
वह एक विशाल कक्ष था,
जिसकी दीवारों पर चिन्ह थे —
कभी संस्कृत के, कभी लैटिन के।
हर चिन्ह किसी स्मृति का प्रतीक था।

मैंने उनमें से एक को छुआ —
क्षणभर में मेरा शरीर हल्का हो गया।
मैं किसी और समय में था —
जहाँ मैं एक साधक नहीं,
बल्कि शिष्य था जो पहली बार यंत्र के सूत्र सीख रहा था।
फिर सब विलीन हो गया।


🕯️ Om Trivedi Thought I

“स्मृति समय की नदी नहीं,
वह आत्मा का दर्पण है जिसमें हर जन्म का प्रतिबिम्ब चमकता है।”


🔹 The Eclipse Itself

चंद्रमा अब पूर्णतः ढक गया था।
अंधकार ऐसा था मानो समय थम गया हो।
तभी मेरे चारों ओर प्रकाश के वृत्त बनने लगे —
कभी श्री यंत्र के रूप में, कभी ब्लैक सन के।
उन वृत्तों से प्रकाश की नहीं, स्मृति की किरणें निकल रही थीं।

मैंने देखा कि उन किरणों में मेरे पिछले जीवन झिलमिला रहे थे —
कभी मैं अघोरी, कभी कवि, कभी पश्चिम का साधक।
हर रूप में एक ही प्रश्न था —
“कौन मैं?”

“तुम वही हो जो स्मृति से परे है,”
स्वर गूँजा,
“पर जब तक तुम स्मृति को स्वीकार नहीं करते,
तुम उसकी सीमा से मुक्त नहीं हो सकते।”


🕯️ Om Trivedi Thought II

“भूलना भी साधना है,
क्योंकि जब सब याद रह जाता है,
तब वर्तमान खो जाता है।”


🔹 The Revelation of Forgetting

ग्रहण धीरे-धीरे हटने लगा।
नीले अंधकार में अब सुनहरी आभा फैल रही थी।
मुझे लगा जैसे ब्रह्मांड स्वयं पुनः जन्म ले रहा है।
हर स्मृति जो अब तक बोझ थी,
धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगी।

मैंने मन ही मन कहा —

“मैं उन सब स्मृतियों को स्वीकार करता हूँ,
जो मुझे मेरी सीमाओं से जोड़ती हैं।”

उस क्षण एक अजीब शांति उतरी —
मानो स्मृति और विस्मृति एक ही तरंग बन गई हों।


🌌 Om Trivedi Experience

ग्रहण के अंत के साथ ही,
मेरे भीतर एक नई रिक्तता बनी —
पर यह रिक्तता भय नहीं, संतोष थी।
अब स्मृति मेरा बंधन नहीं, मेरा शिक्षक थी।
और मैंने जाना —
हर साधक को एक न एक बार
स्मृति के ग्रहण से गुजरना ही पड़ता है।


🜂 Day 17 — The Eclipse of Memory समाप्त।
अगला अध्याय होगा — Day 18 : The Voice between Worlds.

Post a Comment

0 Comments