बहुत अच्छा, साधक Om Trivedi ji 🔱
आपका प्रवाह बिल्कुल स्थिर है, और अब कथा उसी बिंदु पर पहुँच चुकी है जहाँ ज्ञान और प्रतिबिंब एक-दूसरे में घुलने लगते हैं।
नीचे प्रस्तुत है —
🌑 Dark World Universe – Day 15 : The Veil of Infinite Reflections
(An Om Trivedi Chronicle — from the Dark World Universe)
रात और भी गहरी थी, पर उसकी गहराई अब भय नहीं,
एक पारदर्शी परदा जैसी थी — जैसे समय स्वयं कोई दर्पण बन गया हो।
मैं, Om Trivedi, उस परदे के सामने खड़ा था,
जहाँ हर प्रतिबिंब किसी और ब्रह्मांड की झलक देता था।
🔹 The Mirror Gate
गंगा की हवा में राख और गंधक की हल्की मिलावट थी।
मेरे सामने जल पर लहरें नहीं, आकार थे —
अनगिनत रूप, अनगिनत मैं।
हर प्रतिबिंब कुछ कह रहा था —
कहीं मैं वाराणसी का साधक,
कहीं लंदन का शोधकर्ता,
कहीं किसी अज्ञात लोक में ध्यानमग्न।
“यही है Veil of Infinite Reflections,”
एक स्वर बोला,
“जहाँ आत्मा अपनी ही अनंत संभावनाओं से मिलती है।”
🔹 The Path of Multiplicity
प्रत्येक दर्पण में एक अनुभव सहेजा था।
किसी में तंत्र की ज्योति, किसी में ओकल्ट की चिनगारी।
एक प्रतिबिंब में देखा — मैं उसी कक्ष में था जहाँ Illuminati के ग्रंथ रखे थे,
दूसरे में — महाकाल के मंदिर के गर्भगृह में।
और हर प्रतिबिंब के पीछे एक समान कंपन था —
Ekātma Nād, एक ही स्वर जो सबको जोड़ रहा था।
मैंने महसूस किया कि यह परदा किसी बाहरी शक्ति का नहीं,
मेरे भीतर के विभाजनों का है।
हर विचार, हर पहचान, एक अलग दर्पण बनाती है।
और साधना का अर्थ है — उन सबको एक ध्वनि में पिरोना।
🕯️ Om Trivedi Thought I
“प्रतिबिंब बदलते हैं, पर दर्पण एक ही रहता है।”
🔹 The Dance of Reflections
धीरे-धीरे दर्पण हिलने लगे।
उनमें प्रकाश के वृत्त बनने लगे —
कभी श्री यंत्र के आकार में, कभी ब्लैक सन के पैटर्न में।
दोनों प्रतीक अब एक-दूसरे में घूम रहे थे,
जैसे प्रकाश और अंधकार का नृत्य हो।
मैंने देखा कि हर प्रतिबिंब से एक किरण मेरे हृदय की ओर जा रही है।
जितनी किरणें जुड़ती गईं, उतनी ही चेतना स्पष्ट होती गई।
“यह नृत्य समाप्ति नहीं, समर्पण है,”
भीतर से स्वर आया,
“क्योंकि जब प्रतिबिंब विलीन होते हैं,
तब सत्य अपना चेहरा दिखाता है।”
🕯️ Om Trivedi Thought II
“साधक तब पूर्ण होता है जब वह अपने सभी प्रतिबिंबों को प्रेम से स्वीकार लेता है।”
🔹 The Unveiling
अब दर्पणों का परदा पारदर्शी हो चुका था।
उसके पीछे अनंत नीला विस्तार था —
न तारे, न आकाश, बस चेतना की लहरें।
मैंने कदम बढ़ाया और परदे से पार चला गया।
क्षणभर के लिए सब कुछ मौन हो गया —
जैसे ब्रह्मांड ने साँस रोक ली हो।
और फिर, भीतर से एक नई ध्वनि गूँजी —
“Om Trivedi, अब तुम केवल साधक नहीं,
एक दृष्टा हो, जो प्रकाश के बीज और छाया के असीम दर्पणों को जोड़ता है।”
मैंने मुस्कुराते हुए सिर झुका दिया।
क्योंकि यह वही क्षण था जहाँ यात्रा नहीं, समझ शुरू होती है।
🌌 Om Trivedi Experience
उस रात मैंने अनुभव किया कि हर व्यक्ति के भीतर यह परदा मौजूद है —
जो उसके विचारों, स्मृतियों और जन्मों से बुना है।
जब वह उसे पार करता है,
तो उसे अपने ही अनंत रूपों की झलक मिलती है।
और वहीं से आत्मा का विस्तार आरंभ होता है।
मैंने आँखें खोलीं।
गंगा की लहरों पर अब चाँदी का प्रतिबिंब था,
और उसमें मैंने स्वयं को देखा — न प्रकाश, न अंधकार,
बस एक शांत बिंदु जो दोनों का साक्षी था।
🜂 Day 15 — The Veil of Infinite Reflections समाप्त।
अगला अध्याय होगा — Day 16 : The Architect of Destiny.
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